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सीएम से सांसद तक का सफर: नीतीश कुमार ने राज्यसभा की राह चुनी, बिहार की सियासत में शुरू हुआ नया अध्याय

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पटना: बिहार की राजनीति में बीते 24 घंटों के भीतर ऐसा घटनाक्रम देखने को मिला, जिसने पूरे राज्य के राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया। लंबे समय तक मुख्यमंत्री के रूप में बिहार की कमान संभालने वाले नीतीश कुमार ने अब दिल्ली की ओर कदम बढ़ाते हुए राज्यसभा का रास्ता चुन लिया है। उन्होंने बिहार से राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल कर दिया है और इसके साथ ही लगभग दो दशकों से अधिक समय तक चली उनकी मुख्यमंत्री राजनीति एक नए चरण में प्रवेश करती दिखाई दे रही है।
इस फैसले के साथ ही बिहार में नए मुख्यमंत्री को लेकर अटकलों का दौर भी तेज हो गया है। नीतीश कुमार ने स्पष्ट किया है कि बिहार में एनडीए की सहमति से जो भी सरकार बनेगी, वे उसका पूरा समर्थन करेंगे। हालांकि इस फैसले ने न केवल विपक्ष बल्कि उनकी अपनी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के अंदर भी हलचल पैदा कर दी है।
दरअसल, पिछले 24 घंटे के दौरान घटनाक्रम बेहद तेजी से बदला। होली के दिन यानी 4 मार्च की शाम से ही राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हो गई थी कि नीतीश कुमार राज्यसभा जाने पर विचार कर रहे हैं। शुरुआत में इसे राजनीतिक अफवाह माना गया, क्योंकि एनडीए के कई नेताओं ने इस संभावना से इनकार कर दिया था। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान ने भी स्पष्ट कहा था कि बिहार में सरकार नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही चलती रहेगी। वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता गिरिराज सिंह ने इस चर्चा को “होली का मजाक” तक बता दिया था।
हालांकि जेडीयू के कुछ नेताओं का कहना था कि इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर बातचीत चल रही है और अंतिम फैसला खुद नीतीश कुमार ही करेंगे। जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे यह चर्चा राजनीतिक हलकों में गंभीर होती गई।
इसी बीच गुरुवार की सुबह यह खबर सामने आई कि नीतीश कुमार ने राज्यसभा चुनाव लड़ने का अंतिम निर्णय ले लिया है। उन्होंने खुद कहा कि उनका लंबे समय से यह सपना था कि वे देश की चारों प्रमुख विधायी संस्थाओं—विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा—के सदस्य बनें। अब राज्यसभा जाने के साथ उनका यह सपना पूरा होने जा रहा है।
दोपहर में उन्होंने सार्वजनिक रूप से राज्यसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। इस घोषणा के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव की शुरुआत हो चुकी है।
हालांकि इस फैसले को लेकर जेडीयू कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी भी देखने को मिली। पटना स्थित पार्टी कार्यालय में उस समय हंगामे की स्थिति बन गई जब नामांकन की प्रक्रिया के दौरान कार्यकर्ताओं ने विरोध जताया। कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी कार्यालय में खाने-पीने की व्यवस्था की गई थी, लेकिन नाराज समर्थकों ने भोजन करने से इनकार कर दिया। कुछ जगहों पर गुस्से में कार्यकर्ताओं ने टेबल पलट दिए और प्लेट-बर्तन भी तोड़ दिए। यह घटना साफ संकेत दे रही थी कि पार्टी के भीतर भी इस फैसले को लेकर असंतोष मौजूद है।
इसी बीच पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने भी एक अलग मांग सामने रख दी। उनका कहना था कि यदि नीतीश कुमार दिल्ली की राजनीति में सक्रिय होना चाहते हैं तो उन्हें जाने दिया जाए, लेकिन बिहार की कमान उनके बेटे निशांत कुमार को सौंपी जानी चाहिए। पप्पू यादव ने यह भी दावा किया कि भाजपा के पास ऐसा कोई नेता नहीं है, जो बिहार की राजनीति और सामाजिक समीकरणों को नीतीश कुमार की तरह समझता हो।
उधर विपक्षी दलों ने इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा की रणनीति करार दिया है। राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि यह पहले से तय योजना का हिस्सा था, जिसके तहत नीतीश कुमार को बड़े पद का प्रस्ताव देकर बिहार की सत्ता पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश की जा रही है। विपक्ष का आरोप है कि यह कदम राज्य की राजनीति में शक्ति संतुलन बदलने की दिशा में उठाया गया है।
बुधवार रात से ही राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई थी कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा का चुनाव लड़ सकते हैं। इसके साथ ही यह संभावना भी जताई जाने लगी कि बिहार में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है और एनडीए गठबंधन के भीतर नई व्यवस्था बनाई जा सकती है।
अब जबकि नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने की घोषणा कर दी है, बिहार की राजनीति में अगला बड़ा सवाल नए मुख्यमंत्री को लेकर खड़ा हो गया है। राज्यसभा चुनाव 16 मार्च को होने हैं और तकनीकी रूप से तब तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में नए चेहरे को लेकर चर्चाएं तेज हो चुकी हैं।
करीब दो दशकों से बिहार की राजनीति का केंद्र रहे नीतीश कुमार के इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि राज्य की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि एनडीए किस नेता को बिहार की कमान सौंपता है और आने वाले दिनों में राज्य की सत्ता का समीकरण किस दिशा में जाता है।

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